स्टालिन ने कांग्रेस की मांग की खारिज, तमिलनाडु में अकेले चुनाव लड़ेगी डीएमके
तमिलनाडु में सत्ता साझा करने को लेकर चल रही अटकलों पर डीएमके ने साफ रुख अपनाया है। राज्य के वरिष्ठ डीएमके नेता और ग्रामीण विकास मंत्री आई. पेरियासामी ने स्पष्ट कर दिया है कि तमिलनाडु में गठबंधन सरकार की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन सहयोगी दलों, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है उसके साथ सत्ता साझा करने के पक्ष में नहीं हैं।
रविवार को पत्रकारों से बात करते हुए आई. पेरियासामी ने तमिलनाडु कांग्रेस की हालिया सत्ता-साझेदारी की मांग पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मांग करना कांग्रेस का अधिकार है, लेकिन डीएमके ने कभी भी गठबंधन सरकार के मॉडल का समर्थन नहीं किया है। पेरियासामी ने कहा कि तमिलनाडु में अब तक कभी गठबंधन सरकार नहीं रही है और राज्य का शासन हमेशा डीएमके ने अपने दम पर चलाया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी का रुख पूरी तरह स्पष्ट है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा।

उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री एमके स्टालिन इस फैसले पर पूरी तरह अडिग हैं। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर सत्ता में हिस्सेदारी की मांग उठाई है। मार्च-अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस नेताओं ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने कहा कि अब सत्ता में हिस्सेदारी पर चर्चा करने का समय आ गया है। वहीं, कांग्रेस विधायक दल के नेता और कन्याकुमारी से विधायक एस. राजेश कुमार ने भी गठबंधन सरकार के पक्ष में बयान दिया।
तमिलनाडु कांग्रेस के प्रभारी गिरीश चोडंकर ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कौन-सी राजनीतिक पार्टी यह कहेगी कि उसे सत्ता नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर कोई पार्टी सत्ता नहीं चाहती, तो फिर उसे खुद को एक गैर-सरकारी संगठन कहना चाहिए।
आई. पेरियासामी का बयान डीएमके के उस पुराने रुख को दोहराता है, जिसके तहत पार्टी राज्य में अकेले शासन करने की नीति पर कायम रही है। 1967 से अब तक तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके ने गठबंधन में चुनाव लड़ने के बावजूद हमेशा अपने दम पर सरकार बनाई है। राज्य की राजनीति में गठबंधन सरकार का चलन नहीं रहा है। इसका एकमात्र अपवाद 1952 से 1957 के बीच का दौर था, जब तत्कालीन मद्रास राज्य में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था और उसे गैर-कांग्रेस नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा था। 2006 में भी डीएमके ने बिना पूर्ण बहुमत के पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था। उस समय पार्टी को कांग्रेस सहित सहयोगी दलों का बाहरी समर्थन मिला था, लेकिन मंत्रिमंडल में सत्ता साझा नहीं की गई थी। उस दौरान भी कांग्रेस नेताओं ने इसी तरह की मांगें उठाई थीं, लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं किया गया।